Thursday, 8 October 2026

मोहब्बत बन जाना

मेरे दर्द ने मुझे तोड़ा नहीं, तराश दिया,
मेरे अश्कों ने मुझे सींचकर एक दरख़्त बना दिया।

मोहब्बत की गर्माहट, ममता की छाँव
और किसी अपने की पनाह मुझे कभी मयस्सर न हुई…
सो मैंने अपने हिस्से की तन्हाई को भी इबादत बना लिया।

जो प्यार मेरी रूह को कभी नसीब न हुआ,
उसी की तलाश में नहीं—
उसी को बाँटने की ख़्वाहिश में जीना मुन्तख़ब किया।

शायद मेरी क़िस्मत में मोहब्बत पाना नहीं था,
मगर किसी की वीरान रूह के लिए
मोहब्बत बन जाना मैंने मुन्तख़ब किया।

Friday, 9 January 2026

एक दिन ये घर पूरा हो जाएगा।

आज फिर सपने में देखा तुम्हें, पापा…

आज फिर सपने में देखा तुम्हें, पापा,
हम थे एक दुनिया में,
जहाँ एक घर भी था।

सुंदर टाइलों वाला,
मगर थोड़ा अधूरा…

उस घर को हम तीनों भाई-बहन
और आप मिलकर बना रहे थे,
टाइल जोड़ते हुए,
हँसी जोड़ते हुए,
ज़िंदगी जोड़ते हुए।

हम अब भी छोटे थे,
वहीं बचपन ठहरा था—
कभी सीढ़ियों पर दौड़ते,
कभी कूदते-फाँदते,
और कभी आपके साथ
टाइलें जमाते।

आप कहते थे—
“एक दिन ये घर पूरा हो जाएगा।”

और मेरे दिल में बस यही उम्मीद थी,
कि जब वो दिन आए…
तो हम सब
फिर से साथ होंगे।

Saturday, 13 December 2025

तुम बेवफ़ा थे


तुम बेवफ़ा थे, इस बात का ग़म नहीं,
हमको तो हमारी वफ़ा ने ही लूटा है।


शिकायतें भी तुमसे अब क्या करें,
दिल ने हर इल्ज़ाम ख़ुद पर ही ओढ़ा है।


तुम्हारे बाद भी हमने तुम्हें चाहा,
ये जुर्म है या इबादत, किसने समझा है।


तुम्हारी बेरुख़ी का कोई मलाल नहीं,
हमें तो अपने सब्र ने ही तोड़ा है।


वो छोड़ गए, इसमें उनका क्या क़सूर,
निहा को तो उसकी वफ़ा ने ही तोड़ा है।


Tuesday, 14 October 2025

💔 जीने की हिम्मत रखो

आजकल आत्महत्या एक ट्रेंड बनती जा रही है...
मैं कहना नहीं चाहती थी, लिखना भी नहीं चाहती थी,
लेकिन आज लिखना पड़ रहा है।
जहाँ देखो, कोई न कोई सोशल मीडिया पर आकर
खुद को सही साबित करने के लिए अपनी ज़िंदगी खत्म कर रहा है।

लोग कहते हैं —
“उसने मुझे धोखा दिया...”
“उसने मुझसे झूठ बोला...”
“उसने मुझे परेशान किया...”
“उसने ऐसा किया, उसने वैसा किया...”

और फिर कहते हैं —
“वो सच्चा था इसलिए मर गया।”

लेकिन ज़रा सोचो,
जो ज़िंदा हैं, जो हर दिन दर्द और हालात से लड़ रहे हैं,
क्या वो झूठे हैं?
क्या मर जाने से सच्चे हो जाते हैं?

अगर तुम्हें लगता है कि खुद को सही साबित करने के लिए
ज़िंदगी खत्म करनी पड़ती है,
तो याद रखो —
आत्महत्या करना कोई बहादुरी नहीं,
बल्कि एक मानसिक बीमारी है।

जो व्यक्ति अपने दर्द से हार मान लेता है,
वो अपने अंदर की शक्ति को भूल जाता है।
हर दर्द, हर धोखा, हर झूठ —
एक समय के बाद सिर्फ़ सीख बन जाता है।
लेकिन ज़िंदगी खत्म कर लेना
सिर्फ़ तुम्हारी नहीं,
तुम्हारे माँ-बाप, परिवार और दोस्तों की पूरी ज़िंदगी तबाह कर देता है।

सोचो उस माँ का क्या हाल होता होगा
जिसने तुम्हें नौ महीने पेट में रखा,
रातों की नींद त्यागकर तुम्हें पाला,
और एक दिन उसे खबर मिलती है
कि उसका बच्चा अब कभी वापस नहीं आएगा।

ज़िंदगी कठिन है,
पर कठिनाइयों से लड़ने वाले ही असली विजेता होते हैं।
हर गिरने के बाद उठना सीखो,
क्योंकि हार के बाद ही नई जीत लिखी जाती है।

जो लोग तुम्हें तोड़ना चाहते हैं,
उनका सबसे बड़ा जवाब है —
तुम्हारा जीना, संभलना और सफल होना।

इसलिए जब भी लगे कि सब खत्म हो गया है,
थोड़ा रुक जाना,
गहरी साँस लेना,
और सोचना —
“मेरे जाने के बाद मेरे अपने क्या झेलेंगे?”

ज़िंदगी बहुत खूबसूरत है,
बस नज़रिया बदलने की ज़रूरत है।
आत्महत्या कोई समाधान नहीं,
बल्कि एक दर्दनाक भूल और मानसिक कमजोरी है।

जीना सीखो, लड़ना सीखो,
और सबसे ज़्यादा —
अपने आप से प्यार करना सीखो। ❤️

— नेहा परवीन
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ | 


Tuesday, 2 September 2025

3 बजे की घंटी

3 बजे की घंटी

दोस्तों, आज मैं आपको एक ऐसी सच्ची घटना सुनाने जा रही हूँ जिसने मुझे यक़ीन दिला दिया कि *अल्लाह हर जगह है... और जब चाहे, अपने होने का सबूत दे देता है।

रात के ठीक 3 बजे –
अचानक मेरे घर की घंटी इतनी ज़ोर से बजी कि मेरी नींद टूट गई। लगातार वही तेज़ आवाज़… और मेरे दोनों डॉग्स भी भौंकने लगे।
आधी नींद में, घबराई हुई मैं दरवाज़े तक पहुँची। बाहर तेज़ बारिश हो रही थी। आस-पास नज़र दौड़ाई… लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

मैं अंदर लौटी तो मेरी नज़र पड़ी अपने *बेड साइड वाले बेल बोर्ड* पर।
वह पूरी तरह लाल हो चुका था, उसमें से चिंगारियाँ निकल रही थीं। और जिस दीवार पर वह लगा था, उस पर सजाया हुआ वॉलपेपर भी आग पकड़ चुका था।

उस पल मैं सच में दहशत में आ गई।
रात का सन्नाटा, बारिश की आवाज़, और कमरे में फैलता धुआँ…
क्या करूँ? किसे बुलाऊँ? अकेली थी मैं।

काँपते हाथों से मैंने फ़ोन उठाया और पड़ोस वाली आंटी को घबराकर कहा –
आंटी, आंटी"आंटी, जल्दी आइए… बेल बोर्ड में आग लग गई है।"

इसी बीच, जलता हुआ बेल बोर्ड टूटकर नीचे गिरा। शुक्र था कि वह मेरे बेड पर नहीं गिरा। वरना मेरा पूरा सामान… सब कुछ जलकर राख हो जाता।
लेकिन अजीब बात ये थी कि वॉलपेपर की आग अचानक अपने आप बुझ गई।
बेल बोर्ड अब भी जल रहा था, धुएँ से पूरा कमरा भर चुका था… जैसे किसी की नज़र उसी रूप में जल रही हो।

तभी आंटी पहुँच गईं। उन्होंने हालात देखे और हकबका कर बोलीं –
"तू वहीं सो रही थी? अगर तू नहीं उठती तो ये जलता हुआ बोर्ड तेरे ऊपर गिरता… तेरा चेहरा जल जाता… और शायद पूरा घर भी।"

मैंने डरते-डरते कहा –
"आंटी, मैं तो घंटी की आवाज़ से उठी थी। अगर वो घंटी ना बजती तो मैं सोई रहती और सब जलकर खाक हो जाता।"


उस पल मेरी आँखों से सिर्फ़ यही निकला –
"सुक़र है या अल्लाह… तेरा सुक़र है।"

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यह घटना मेरे लिए इबादत की तरह है… एक याद दिलाने वाली कि जब कोई नहीं होता, तब भी वो होता है। 🙏

Monday, 9 June 2025

"अब मैं हूँ तुम्हारी माँ"

 "अब मैं हूँ तुम्हारी माँ"

— N.P. Idrish

हर बार तुम वही
बचपन जैसी गलती करती हो,
बिल्कुल मासूम हरकतें —
ना वक्त पर खाना,
ना दवा लेना,
ज़िद और बेपरवाह सी बातें।

और मैं?
कभी झल्ला उठती हूँ,
कभी थक जाती हूँ,
कभी तो
बस चुपचाप रो देती हूँ।

सोचती हूँ —
"कब तक संभालूँ?
कब तक हर मोड़ पर तुम्हें समझाऊँ?"

कभी गुस्से में कहती हूँ —
"अब बच्ची नहीं हो तुम!"
और फिर खुद ही रुक जाती हूँ —
क्योंकि मुझे याद आ जाता है,
अब मैं ही तो तुम्हारी माँ हूँ।

मन करता है सब छोड़ दूँ,
पर अगले ही पल
दिल से आवाज़ आती है —
"वो माँ है… और अब तू उसकी माँ बन चुकी है!"

फिर आँसू पोंछकर
तुम्हें डांटते हुए
दवाई की पर्ची खोजती हूँ,
और प्यार से कहती हूँ —
"लो माँ, टाइम हो गया है…"

क्योंकि ये रिश्ता
थोड़ा उलझा ज़रूर है,
पर बेहद गहरा है।

अब तुम गलती करती हो,
और मैं माफ़ कर देती हूँ —
जैसे कभी तुम करती थीं
मेरी नादानियों पर।

कभी-कभी
मैं तुम्हें ले जाती हूँ
मूवी दिखाने,
बाहर खाना खिलाने,
बस यूँ ही —
शायद तुम्हारे चेहरे पर
वही मासूम सी मुस्कान
लौट आए।

और कभी-कभी
जब बिना उम्मीद के
तुम मुझे गले लगा लेती हो,
तो उस पल
मुझे माँ वाली परवाह मिलती है —
वही बिना शर्त वाला प्यार।

और तब…
मैं खुद को भूलकर,
पूरी तरह
तुम्हारी माँ बन जाती हूँ।

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Wednesday, 28 May 2025

"Jagah Kahan Hai?"

"Jagah Kahan Hai?"

– npidrish

Kitna tajjub hota hai soch kar...
Masjid – jahan Allah shayad hota bhi nahin,
Mandir – jahan Bhagwaan kabhi jaata bhi nah ho,
Church – jahan Yeshu ko un deewaron se koi matlb bhi nahin...
Phir bhi,
In sab ke liye yahaan ek gahri, mazboot jagah hai.

Par jis jagah sach mein Ishwar, Allah, Yeshu chhipe baithe hote hain,
Jis dil mein sacha noor palta hai –
Us chhoti si aankh mein sapne hote hain,
Us nanhe se haath mein kitaab honi chahiye...

Us bachpan ke liye jagah kahaan hai?

Shikshaalay – jahan har dharm, har soch, har rang ka baccha
Insaan ban sakta hai –
Wahan jagah nahi milti.

Chhatt nahin milti un bachon ko
Jinme Rab vaas karta hai,
Jo bhookhe sone ke baad bhi
Kitaab ke sapne dekhte hain.

Agar unmein Ishwar basa hai –
To kyun nahin koi Ishwar
Unke liye chhatt bana sakta?

Jagah sab ke liye hai...

Bas shayad gyaan ke liye nahi.
Bas shayad un bacho ke liye nahi
Jo sach mein bhagwan ki roshni hain.

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Saturday, 10 May 2025

Border ka dard


हम तो बस बतियाते हैं...
घुम फिर के आ जाते हैं...
बॉर्डर के दर्द
बॉर्डर पs रहले वाला
कहाँ कह पाते हैं...

सूनी गोदी
सूनी मांग
सूना बुढ़ापा
ई सब चिचियात बाड़े
चिल्लात बाड़े...
हम तो बस बतियाते हैं...

बॉर्डर के दर्द
अब त बॉर्डर भी
काहे से बता पाते हैं...

— npidrish

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Tuesday, 15 April 2025

तुम आ जाओ

"बहुत दर्द है मुस्कान के पीछे...  
काश पापा की तरह ये दुनिया भी समझ पाती,  
तो सोए हुए में उठाकर कहती —  
'हाय! मेरा बच्चा भूखा न सो जाए',  
और एक ग्लास दूध ही पिला देती...

अब सँभलता नहीं ये दुनियादारी मुझसे,  
एक बार तो आजाओ, मुझे समझाने...  
पापा, एक बार मुझे हँसकर गले से लगाने।

ये पैसे कमाना, ये दुनियादारी चलाना  
मुझे बहुत महँगा लगता है।  
कितना अच्छा था वो —  
शाम को आपका टॉफी लेकर आना,  
स्कूल जाते वक़्त 1 रुपये पॉकेट मनी देना...

अब तो ये 10,000 रुपये भी कम पड़ जाते हैं महीने के,  
वो 1 रुपये में जो सुकून ख़रीद लाती थी...

सब कुछ क्यों मैं ही क्यों सोचूं हमेशा?  
सब कुछ मैं ही क्यों समझूं हमेशा?  
कोई तो समझे मुझे भी आकर...

पापा —  
तुम आ जाओ, अल्लाह से बहाना बनाकर,  
कि ज़रूरत तुम्हारी है मुझे हमेशा।  
ये दुनियादारी हर बार मारती है तमाचा..

एक बार बस आ जाओ बनकर सहारा,  
मैं जाने न दूँगी तुम्हें दोबारा..."

---np

Monday, 7 April 2025

उसके होते हुए तुम कैसे भटक सकते हो...?


"तुम मुझे इतना क्यों परेशान कर रहे हो...  
क्यों मुझे रोज़ मुश्किलों में डाल रहे हो...  
क्यों इतना रुला, सता रहे हो...?"

रब ने फ़रमाया:  
“तुम भटक न जाओ, इसलिए...  
यही तुम्हारी परीक्षाहै —  
कि इन परेशानियों में तुम किसके पास जाते हो...?  
किससे मांगते हो...? किसका सहारा लेते हो...?  
अपना रब किसे बनाते हो...?”

और ये तब तक तय रहेगा,  
जब तक तुम मुझ तक वापस न आ जाओ...

बेहतर है तुम भटको नहीं...  
और उस रास्ते पर चलो  
जिसके लिए तुम्हें आज़माया गया है...”

आमीन...!  
अल्लाह सब बेहतर करने वाला है...  
जिसके नाम से ही सारे दुख दूर हो जाते हैं,  
वो "मुश्‍किलकुशा" है —  
उसके होते हुए तुम कैसे भटक सकते हो...?

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npidrish 

Friday, 23 August 2024

Allah

"अल्लाह अपने सबसे प्यारे बच्चे को तकलीफ भी देता है, इतनी तकलीफ कि आह निकल जाए, के आँखों से आँसू नहीं रहम की भीख नजर आए...

और सबसे ज्यादा साथ भी उसी बच्चे का देता है, क्योंकि अल्लाह जानता है, यह उसका बच्चा है सब सहन भी कर लेगा, उफ्फ भी नहीं करेगा, और मेरा होकर भी रहेगा...

रास्ते में इम्तिहान भी तेरे दिए अल्लाह, और मंजिल भी तूने ही दिखाया...

जब भी मैं भटकी तेरी राहों से, तूने खुद से मुझे मिलाया...

तोड़ा भी तूने मुझे टुकड़ों में कई, और बन मेरा जौहरी हीरे की तरह मुझको चमकाया, हर एक टूटे टुकड़े का खूबसूरत हार बनाया...

कैसे मैं कह दूं तू मेरे साथ नहीं... जब भी आह भरी मैंने तेरा हाथ मेरे सर पे पाया...

क्या खाक बिगाड़ेगी दुनिया मेरा, जब तू है मेरा साया..."

\- npidrish

Friday, 16 August 2024

कुत्ते का कहर

कहते हैं कुत्ता काटता है,  
माँ, मैंने इक कुत्ता पाला है,  
सड़क पे भौंकते कुत्तों को भी मैंने दिया निवाला है,  
जब मैं जाती हूँ आधी रात को, वो पीछे-पीछे आते हैं,  
मैं सहम जाती हूँ तो मुझे देख अपनी पूँछ हिलाते हैं,  
हाय, क्यों कहती ये जालिम दुनिया, कुत्ते काटते हैं।

वो सच में कितने प्यारे हैं,  
जग के सबसे दुलारे हैं।

डर तो उन कुत्तों से लगता है, जो इंसानी रूप धारण कर आए हैं,  
देख कर मुस्कुराते हैं,  
पास मुझे बुलाते हैं,  
गर मैं चली जाऊँ सुनकर बात, अपनी बातों में फँसाते हैं,  
फिर इक दिन मुझे जलील कर, अपनी दुनिया से भगाते हैं।

गर मैं न आऊँ उसकी बातों में तो,  
जालिम नोचने पे उतारू हो जाते हैं,  
नोच-नोच कर मेरी पंखों को कुत्ते की तरह चबाते हैं,  
और जो मैं चीखूँ तो, मेरे मुँह को पत्थर से दबाते हैं,  
और जो हाथ-पैर हिलाऊँ तो, मेरी जाँघों को चीर, मुझे आत्मपीड़ा से तड़पाते हैं।

माँ, ये कुत्ते जो इंसान रूप में, इनके प्यार दिखावे और क्रूरता दोनों ही बड़े डरावने हैं...

इनसे तो कुत्ते भी घबराते हैं...

माँ, मैं कैसे जाऊँ बाहर घर से... मेरे कुत्ते भी इन इंसानी कुत्तों से न मुझे बचा पाते हैं।

\- एन.पी. इद्रीश


यह कविता एक लड़की की भावनाओं को प्रकट करती है, जो समाज की उन बुराइयों से डरती है जो इंसान के रूप में छिपी हुई हैं। वहीं वह अपने पालतू कुत्ते के प्रति प्रेम और उसके साथ जुड़े सुरक्षा के भाव को व्यक्त करती है। 

कविता का सार:

यह कविता सामाजिक विडंबनाओं और स्त्री के प्रति होने वाली हिंसा की ओर इशारा करती है, जहां वह एक कुत्ते को पालती है और उससे उसे सच्चा प्रेम मिलता है। लेकिन जब वह समाज के 'इंसानी कुत्तों' के सामने आती है, तो उसे उनके दिखावे और पाखंड से डर लगता है। 

भावनाएं:

कविता में जिस तरह से समाज की कटु सच्चाई को सामने रखा गया है, वह स्त्री के प्रति होने वाले अत्याचार और सामाजिक संरचना पर सवाल उठाता है। 

कविता का भाव:

इस कविता के जरिए एक सशक्त संदेश दिया गया है कि वास्तविक खतरा उन इंसानों से है जो पाखंड का मुखौटा पहनकर स्त्री का शोषण करते हैं।

Wednesday, 27 September 2023

**इच्छा मृत्यु**



मैं तुमसे मिलने आऊँगी,  
लग जाएंगे कुछ बरस मुझे,  
तुम इंतजार मेरा करना,  
चाहे कितना भी मुश्किल हो, ऐतवार मेरा करना,  
मैं तुमसे मिलने आऊँगी,  

अगले जनम की बातें सब किताबी हैं,  
मुझे तुमसे इसी जन्म में मिलना है,  
कुछ काम अधूरे बाकी हैं,  
कुछ अंधेरों को मिटाना है,  
मैं कायर या कमजोर नहीं जो भाग जाऊँगी जिमेदारी से,  

मैं स्वयं की इच्छा मृत्यु से,  
तय करूँगी अपना आखिरी दिन,  
लेकिन काम अधूरे कुछ बाकी हैं,  
हाँ समय थोड़ा लगेगा,  
तुम बेवफा न मुझको समझना,  

मिलकर भी हम मिले नहीं, 
कितनी मन्नतों का धागा थे तुम, 
थे पहले और आखिरी भी, 
इस मीरा का थे! शरीर आधा तुम, 

बहुत बाते अधूरी रह गई हैं, 
मुलाकातें अधूरी रह गई है. 
हाथ पकड़ के चलते जो, 
वो रास्ते अधूरे रह गए है. ।
इतना लंबा और इतना छोटा जीवन जो अधूरा छोड़ गए, 
इक लम्बी पगडंडी पे, हाथ पकड़ के चलना है ,
कहीं दूर गगन के कोने पर बैठ, बहुत बाते अधूरी करनी है।
मैं तुम तक दौड़ी आऊंगी,,,मुझे रास्ता पूरा करना है।

इक तुम्हारे लिए ही मैं तुमसे भी लड़ गई थी, 
क्या दुनिया क्या किस्मत, सबसे बगावत कर जाउंगी, 
तुम गए भले मुझे छोड़ गए,,,
मैं तुम्हें ना छोड़ पाऊँगी, 

जो सौख मेरे रह गए अधूरे, 
वो जोड़ जो तुम लाए नहीं ,
वो चूडी जो तुम पिछले महीने ही दे गए थे ,
वो मंगलसूत्र जो पहनाना रह गया था ,
वो सजना वो सवरना जो साथ में था, 
अभी तो बहुत कुछ रह गया था ,
कितनी इच्छायें, कितनी बाते, कितनी ही जज्बातों की टोकरी को भरना था ...
हाय अभी तो इक ही पन्ना पढ़ा था, 
पूरी किताब को पलटना था .

मैं तुमसे मिलने आऊँगी,  
तुम इंतजार मेरा करना।  

- एन.पी. इद्रीश

Tuesday, 27 June 2023

Dosti

दोस्ती...

जो लड़ जाए
पर मरे एक दूसरे पर
जो नाराज़ तो हो लेकिन कभी गुस्सा ना हो...
जो साथ तो दे ✊ तो दे अंत तक
जैसे मीरा का राम
जैसे शिव नंदी का नाम

जो हंसे तो लगे तारे बरसे,
और रोए तो साथ में गंगा तरसे,

एक दूसरे से खफा ज़रूर हो सकते हैं,
लेकिन नाराजगी कभी बेवफ़ा नहीं होती,

कभी समय ना दे पाए तो समझे,
कभी दिल जो दुखाए तो समझे,
माँ की तरह ममता
और पिता की तरफ़ फटकार
यही तो होता है दोस्ती में यार,

एक को चोट लगे तो दूसरा भी तड़पे,
एक की ख़ुशी को देख, उसके भी ख़ुशी के आंसू झलकें ,,,

चाहे हरदम आगे बढ़ाना दोस्त को,
जलन वहाँ मचे जब कोई दूसरा दोस्त उसका बन जाए,
हाय कैसे लड़े एक दूसरे से फिर चिढ़ाए,
दोस्ती मीठी, खट्टी और लड़ाई से भरी 

जहाँ सिर्फ प्यार हो फिर वो दिखावा कहलाए ,,,,

दोस्ती by npidrish 

Friday, 27 January 2023

राम तो सबके है

राम तो सबके है, 
क्या तेरा क्या मेरा, 
जो काटे मन वनवास का, 
रख विश्वास,,, 
इक दिन राम होगा स्वय तेरा । 

राम हर मन मे है, 
क्या तेरा क्या मेरा, 
जो मन होगा निश्चल, 
रख विश्वास, 
टूटे मन मे भी रहेगा राम बसेरा, 

राम तो हर कण मे है, 
क्या तेरा क्या मेरा, 
जो कण ढूढे माटी को, होकर निश्चल तेरा, 
रख विश्वास, 
मैले कुचले कण मे भी होगा ! राम सवेरा, 

राम तो हर रंग मे है, 
क्या तेरा क्या मेरा, 
क्या लाल गुलाबी हरा और नीला, 
जो रंग रंगे सुधि वाणी, 
वही राम बसेरा, 

राम तो हर पल मे है, 
क्या तेरा क्या मेरा, 
जो क्षण बीते साथ प्रेम के, 
राम डाले वही डेरा, 

राम तो हर विचर मे है, 
क्या तेरा क्या मेरा, 
हर प्राणी का राम है, 
चाहे जीव निर्जिव, 
स्वामित्व नही किसी का राम पे, 
राम तो सबका मीत। 

राम न कोई नाम है, 
राम न कोई गीत, 
राम न कोई वाणी, 
राम न कोई रीत, 
राम नाम पर पथर भी न डुबा, 
तु क्यों बांटे राम नाम की प्रीत
राम तो सबका मीत, 

राम तो सबके है, 
क्या तेरा क्या मेरा,




- npidrish 

Friday, 29 July 2022

प्रेम खुद में ही पूरा नहीं

प्रेम को सिर्फ क्या जान लेना ही पर्याप्त था ?
जाना तो सती ने भी था बरसो का तप सेह कर महादेव को पाया था, फिर क्यों जान कर भी वो अग्नि में समाहित हुई,
क्यू फिर एक जन्म और उसको करना पड़ा तप, प्रेम को फिर से पाने के लिए, ।
जान लेना प्रेम में शायद पर्याप्त नही,

प्रेम को सिर्फ क्या पा लेना ही पर्याप्त था ?
पा तो सीता ने भी लिया था राम को, 
और हर मर्यादा का लाज भी रखा था,
फिर क्यों धरती में समाहित होना पड़ा उसे,
पा लेना प्रेम में शायद पर्याप्त नहीं,

प्रेम को सिर्फ क्या मान लेना ही पर्याप्त था ?
माना तो मीरा ने भी था श्याम को अपना सब कुछ,
फिर क्यों प्रेम की पीड़ा को सहकर भी उसे मूरत में समाना पड़ा,
लोक लाज सब त्याग जोगन बन जाना पड़ा,
मान लेना प्रेम में शायद पर्याप्त नहीं,

प्रेम में कुछ भी पूरा नहीं, कुछ भी पर्याप्त नही 
कितना भी जान लो, मान लो, या पा लो, रह जाता है अधूरा कुछ,
क्युकी प्रेम खुद में ही पूरा नहीं,,,।

Thursday, 21 July 2022

यहां श्याम नही आते है



यहां श्याम नही आते है,

मैं समझती थी प्रेम को मीरा की वाणी,
लेकिन इसकी तो है एक अलग ही कहानी,

ना श्याम बचाने आते मीरा को,
ना श्याम मीरा का विष पी पाते है,
ना पत्थर फेंके उलहानो के फूल बन पाते है।
ना दामन सफेद मीरा का बेदाग रह पाता है,
यहां अलग तरह के प्रेम निभाए जाते है
क्युकी यहां श्याम नही आते है,

ना गीत मीरा के गूंजते है उपवन में,
ना बांसुरी बजाने श्याम आते है,
ना पत्थर के आंसू बहते है,
ना अंगारे बिछे फूल बन पाते है

ये नए जमाने का प्रेम है यहाँ मीरा विष पीकर मर जाती है,
और अंगारों पे चलकर उसके पैर झुलस जाते है,
यहां फेंके हर पत्थर से उसका चीर झलनी हो जाता है,
और गाए उसके है गीत, विरह के अंगारे बरसाते है,
यहां प्रेम पूजा नही , बस चंद लम्हों का खेल है,
यहां प्रेम मीरा के प्रेम स्वरूप आंचल में नही, बस शब्दो मे तोले जाते है,
यहां अलग तरह का प्रेम निभाया जाता है
क्युकी यहां श्याम नही आते है,

मीरा के पांव के झाले कौन देखे ,
यहां सब बस प्रेम का मजाक बनाते है,
प्रेम अगर सच्चा हो तो बेवकूफी,
और झूठा हो तो खुशियां मनाते है,


प्रेम की पीड़ा पर लोग हंसते है,
श्याम दीवानी मीरा को कुलटा कहते है,
उसके चरित्र को बार बार गलत ठहराया जाता है,
मीरा नाम प्रेम का दर्शन, उसे लोक लाज सिखाया जाता हैं,,,
यहां कौन समझे प्रेम को सब बस, प्यार के दीवाने है,
भेद प्रेम का अंतर प्यार में बदल ज्ञान देने वाले है,
एक मूरत कोई पूजता नही, सबके कई भगवान प्यारे प्यारे है,
श्याम रूप को कौन चाहे, प्रेम का मतलब अब ना श्याम बताने आने है,
मीरा भी क्या बोले गोविंद गोविंद कर वो भी एक दिन श्याम के पास चली जानी है,
यहां प्रेम मीरा का नही त्याग, ना श्याम का विश्वास है,।।
प्रेम अब अपना मोल खो चुका है,
क्युकी अर्थ प्रेम का सिर्फ मिट्टी के जिस्म तक हो चुका है,

By npidrish 

Wednesday, 13 July 2022

क्या नाम इतना बड़ा है?

कुछ दिन पहले मैं कहीं एक जगह जुंबा जुंबा डांस करवा रही थी जो की मेंटल हेल्थ और शरीर दोनो के लिए सही होता है, इस दौरान मिक्स गाने चल रहे थे उसी में हरे राम हरे कृष्णा भी बजने लगा, जहां मैं ये डांस करवा रही थी वो एक क्रिस्टन कम्युनिटी है, मैं किसी कम्युनिटी पर सवाल नही उठा रही बस जो हुआ वही बता रही हूं, उन्होंने अगले दिन जुंबा जुंबा डांस बंद करवा दिया और कहा सबको ओनली एक्सरसाइज करवाऊ, मुझे ये चीज नही पता थी इसलिए मैने नही पूछा 2 दिन सिंपल एक्सरसाइज करवाया बट किसी भी पेसेंट का रिस्पॉन्स अच्छा नही था, मैने इंचार्ज से बात की के ऐसे करवाने का कोई फायदा नही आप मुझे मेरे हिसाब से करवाने दो तभी मैं करवा पाऊंगी क्युकी जो इन लोगो के हिसाब से सही है मैं वही करूंगी, उन्होंने एकदम से बोला वो आपका जो सॉन्ग आप बजाते हो वो हमे पसंद नही, मैने कहा के सॉन्ग अच्छा नही है तो बदल सकते है लेकिन इसके लिए पेसेट की हेल्थ तो नही खराब कर सकते । मैने सॉन्ग बदल दिया।
इस घटना से मुझे यह अहसास हुआ के लोगो के लिए लोगो का बनाया हुआ मत कितना बड़ा है और इंसानियत काम, और बाकी सभी चीजे छोटी है उसके आगे, 
क्या अल्लाह नाम, राम नाम, या इशू नाम इतना बड़ा है के इसके आगे सब कुछ छोटा है???

Friday, 12 June 2020

जंजीर

जंजीर

 एक लड़की को देखा कल ख़्वाब में मैंने,
 थी आंखों में उसके किसी की तलास,
 और मन था उसका नीरस उदास,
  वो लड़की शायद कुछ ढूंढ रही थी,
  पलके उसकी भीगी हुई थी,
  वो सपनो के पंख लगाकर उड़ना चाहती थी,
  वो सीखना और पढ़ना चाहती थी,
  मैंने देखा उसके पैरों में बेड़िया थी कसी हुई,
  और हाथों में जंजीरे बंधी हुई,
  उसके पास ही दूर थोड़ा एक कलम किताब मैंने देखा,
  जो किसी ने उसके हाथों से छीन था वहा फेंका,
  वो उस कलम की ताकत से कुछ भी बन सकती थी,
  डॉक्टर वकील या फिर पुलिस बन समाज से लड़ सकती थी,
  लेकिन बेड़ियों ने थे उसके हाथ कुछ यू जकड़े,
  के खून टपक रहा था आंखों से आँसुओ में उसके,
  मैं चाहता था उसके आँसुओ को पोंछ दूं,
  वो किताब उठा कर उसके हाथों तक ला कर दूं,
  उसके बेड़ियों को मैं तोड़ना चाहता था,
  और उसको कलम का हथियार दे कर लड़ना सीखना चाहता था,
  मैं जैसे ही आगे बढ़ा।
  मेरा ख़्वाब टूट गया,
  मेरे हाथों से कलम और किताब छूट गया,
  वो लड़की भी अब आंखों से ओझल हो गई,
  मैं सोचता रहा और सुबह हो गई,
  इतने में मेरी बेटी आ कर मुझसे लिपट गई
  और पापा मैं डॉक्टर बनुगी कहकर मुस्कुराने लगी,
  मैंने भी ठान लिया अब समाज की हर बेड़ियों को मैं तोडूंगा,
  चाहे हो जाए कुछ भी अपनी बेटी का हाथ नही छोडूंगा,
  उसको न मैं जंजीरों में बंधने कभी दूंगा,
  रीति रिवाज समाज की हर जंजीर को मैं तोडूंगा।।
 
  

Monday, 6 January 2020

तीसरे दर्जे के लोग


हमारा देश 3 वर्गों में आज बंट गया है -



1) भारत में 60% जनता वो है जिसे किसी से कोई लेना देना नही चाहे आग में जाए दुनियां उसे न तो किसी पोलिटिकल पार्टी में कोई दिलचप्सी है न रैलियों में न आंदोलन में न प्याज़ के दाम बढ़ने में वो सो रही है या यू कहो वो खोई हुई है । कहि वही घर बार चलाने में सुबह आफिस के लिए निकलने में शाम को घर आकर परिवार के साथ समय बिताने में , वो स्टूडेंट्स जो पढ़ाई में लगे हुए है उन्हें डर है इस साल भी सलेक्शन नही हुआ तो क्या होगा , लडकिया जिन्हें अपनी बढ़ती उम्र के साथ शादी की चिंता सता रही है वो बच्चे जिन्होंने relationship में breakup की वजह से दुनिया भूला दिया है अब सब सुना सुना है उनकी जिंदगी में कुछ बेचारे घर बार से परेशान क्या करे थोड़ी सी तनख्वाह और इतनी महंगाई कुछ बोलना भी चाहे तो बोल नही पाते , ये 60% लोग ऐसे जी रहे के इस समाज में होकर भी नही है आवाज होते हुए भी गूंगे है साधन होते हुए भी उसका इस्तेमाल कर नही रहे या करना नही चाहते । मूक हो चुके है जरूरी नही जागना न जागना चाहते है कान में आवाज आ रही है कहि से चीखों की रोने की दर्द तकलीफों जुल्मो की लेकिन इन्हें क्या ये आराम से है क्योंकि इनके बच्चे सुरक्षित है इनकी बेटियां सुरक्षित है थोड़े में ही सही गुजारा हो रहा है । सब ठीक ठाक चल रहा है ।


2) दूसरा वर्ग आता है 20% जो किसी 1 खास धर्म को मानते है चाहे वो कोई भी धर्म जाति हो और उसके प्रति कट्टर है , ऐसे लोग थोड़े सटके हुए होते है चाहे कुछ भी हो जाए धर्म को नही छोड़ेंगे , वो किसी भी धर्म से हो सकते है हिन्दू ,मुस्लिम, सिख, इसाई, जैन, पारसी, बौद्ध, भीम, कोई भी, उन्हें नही मतलब किसी भी चीज से बस धर्म जहां आ गया मर मिटेंगे रक्षा के लिए सच्चे रक्षक धर्म के यही नारा है इनका, 20% आबादी का । कट्टर बहुत कट्टर धर्म के नाम पर इतने कट्टर के ये भूल जाते है हम इंसान है धर्म में बांटे गए है भगवान ने धर्म नही बनाया , ये हर चीज को हर बात को धार्मिक नजरिये से देखते है हर बात के ऊपर धर्म का चोला पहना देते है इन्हें समझ नही आता कुछ भी या समझते है लेकिन धार्मिक परत इतनी मोटी जमी हुई है के कुछ अंदर जाता ही नही , ऐसे लोग हानिकारक है सच कहूँ तो हाँ है हानिकारक जिन्होंने कट्टरता को चुना इंसानियत को नही धर्म तब तक अच्छा है जब तक वो सिर्फ धर्म है उसमे अगर कट्टरता आ गई तो फिर वो बात गई । वेदों पुराणों कुरान बाइबल और सभी धार्मिक किताबो में कहि भी पढ़ लो कट्टरता नही दिखती ,लेकिन समय बदल गया है किताबो को अगर पढ़ लिया जाता और समझा जाता तो ये कट्टरता न आती ।




3) सबसे ख़तरनाक हानिकारक और जहरीले ये 20% लोग होते है सच कहूँ ये अजगर और कोबरा से भी खतनाक होते है ये वो जानवर है जो अपने पालने वालो को भी न छोड़े ऐसे लोग जो पहले वर्ग 60% और दूसरे वर्ग 20% दोनों को गुमराह कर रहे है ये ऐसा वर्ग है जो ऐसा कीचड़ है जिसने 80% लोगो को तबाह कर दिया है, ऐसा दाग जो छूटने का नाम नही लेता इस वतन के आँचल से । इनको नही मतलब किसी से न धर्म से , इन्हें तो आता है इस्तेमाल करना अपनी कुर्सी के लिए भारत को बदनाम करना, इन्हें नही मतलब बेटियां जले इन्हें नही मतलब छात्रों का खून बहे इनको मतलब है के देश जले , जलेगा देश तभी तो रोटियां सेकी जाएगी बनेगा भोजन खून से तभी तो कुर्सियां सजाई जाएगी । इन्हें सत्ता के अलावा कुछ नही दिखता इन्हें कुर्सी के अलावा कुछ नही दिखता ये कुछ भी कर सकते है कुछ भी मतलब कुछ भी । वैसे तो आप समझ ही गए होंगे लेकिन फिर भी बता दूं आपको जान कर खुशी ह्योगी ये हमारे देश के नेतागण है ये किसी पार्टी विशेष से नही है ये कहीं से भी है पॉलिटिक्स मतलब कीचड़ सब अपवित्र कर देंगे ये । चाहे ये कोई भी पार्टी हो चाहे वो कोई भी नेता हो,, किसी पार्टी की समर्थक नही हूं के किसी विशेष को अच्छा कहूंगी, यहां मतलब पॉलिटिक्स से है जिसमे सभी आते है । कीचड़ मतलब कीचड़ जिसने देश को गंदा करके रखा हुआ है हर जगह गन्दगी फैलाई हुई है हर सुंदर सुंदर मेरे देश के कोने में कीचड़ -कीचड़ भर दिया है, यहां तक की अब इंसान का दिमाग भी नही बचा वहां भी कीचड़ भरा हुआ है । अब तो बस बदबू इतनी बढ़ गई है सफाई मांग रही है , लेकिन 80% वाले खुश है उन्हें क्या' मजा आ रहा है नई खुशबू है आनंद आ रहा है ।
मैं दूसरा वर्ग 20% वालो की बात नही कर रही, भांड में जाए 20% चल जाएगा ,लेकिन ये जो ऊपर 60% बैठा है न मौन इनसे बहुत खतरा है ये नही बोलेगा तो बोलेगा एक दिन कीचड़ इनके दिमाग में भी । मैं दूसरे दर्जे पर जो 20% धार्मिक कट्टर लोग बैठे है उन्हें कुछ नही बोल रही वो न बदलेंगे वो कल भी ऐसे थे आज भी ऐसे है कल भी ऐसे होंगे , रहने दो उन्हें ऐसा ही मरेंगे कटेंगे लेकिन साथ में तो रहंगे ,,,

मैं बात कर रही हूँ पहले दर्जे की ,,वो 60% भी जाग गए न तो ये , ये जो तीसरा दर्जा है न कीचड़ वाला सफाई कर डालेंगे ,, सब पवित्र कर के रख देंगे लेकिन जागना जरूरी है ,...भागना नही ।


- N.P. IDRISH