आज फिर सपने में देखा तुम्हें, पापा,
हम थे एक दुनिया में,
जहाँ एक घर भी था।
सुंदर टाइलों वाला,
मगर थोड़ा अधूरा…
उस घर को हम तीनों भाई-बहन
और आप मिलकर बना रहे थे,
टाइल जोड़ते हुए,
हँसी जोड़ते हुए,
ज़िंदगी जोड़ते हुए।
हम अब भी छोटे थे,
वहीं बचपन ठहरा था—
कभी सीढ़ियों पर दौड़ते,
कभी कूदते-फाँदते,
और कभी आपके साथ
टाइलें जमाते।
आप कहते थे—
“एक दिन ये घर पूरा हो जाएगा।”
और मेरे दिल में बस यही उम्मीद थी,
कि जब वो दिन आए…
तो हम सब
फिर से साथ होंगे।
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