मेरे दर्द ने मुझे तोड़ा नहीं, तराश दिया,
मेरे अश्कों ने मुझे सींचकर एक दरख़्त बना दिया।
मोहब्बत की गर्माहट, ममता की छाँव
और किसी अपने की पनाह मुझे कभी मयस्सर न हुई…
सो मैंने अपने हिस्से की तन्हाई को भी इबादत बना लिया।
जो प्यार मेरी रूह को कभी नसीब न हुआ,
उसी की तलाश में नहीं—
उसी को बाँटने की ख़्वाहिश में जीना मुन्तख़ब किया।
शायद मेरी क़िस्मत में मोहब्बत पाना नहीं था,
मगर किसी की वीरान रूह के लिए
मोहब्बत बन जाना मैंने मुन्तख़ब किया।
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