आजकल आत्महत्या एक ट्रेंड बनती जा रही है...
मैं कहना नहीं चाहती थी, लिखना भी नहीं चाहती थी,
लेकिन आज लिखना पड़ रहा है।
जहाँ देखो, कोई न कोई सोशल मीडिया पर आकर
खुद को सही साबित करने के लिए अपनी ज़िंदगी खत्म कर रहा है।
लोग कहते हैं —
“उसने मुझे धोखा दिया...”
“उसने मुझसे झूठ बोला...”
“उसने मुझे परेशान किया...”
“उसने ऐसा किया, उसने वैसा किया...”
और फिर कहते हैं —
“वो सच्चा था इसलिए मर गया।”
लेकिन ज़रा सोचो,
जो ज़िंदा हैं, जो हर दिन दर्द और हालात से लड़ रहे हैं,
क्या वो झूठे हैं?
क्या मर जाने से सच्चे हो जाते हैं?
अगर तुम्हें लगता है कि खुद को सही साबित करने के लिए
ज़िंदगी खत्म करनी पड़ती है,
तो याद रखो —
आत्महत्या करना कोई बहादुरी नहीं,
बल्कि एक मानसिक बीमारी है।
जो व्यक्ति अपने दर्द से हार मान लेता है,
वो अपने अंदर की शक्ति को भूल जाता है।
हर दर्द, हर धोखा, हर झूठ —
एक समय के बाद सिर्फ़ सीख बन जाता है।
लेकिन ज़िंदगी खत्म कर लेना
सिर्फ़ तुम्हारी नहीं,
तुम्हारे माँ-बाप, परिवार और दोस्तों की पूरी ज़िंदगी तबाह कर देता है।
सोचो उस माँ का क्या हाल होता होगा
जिसने तुम्हें नौ महीने पेट में रखा,
रातों की नींद त्यागकर तुम्हें पाला,
और एक दिन उसे खबर मिलती है
कि उसका बच्चा अब कभी वापस नहीं आएगा।
ज़िंदगी कठिन है,
पर कठिनाइयों से लड़ने वाले ही असली विजेता होते हैं।
हर गिरने के बाद उठना सीखो,
क्योंकि हार के बाद ही नई जीत लिखी जाती है।
जो लोग तुम्हें तोड़ना चाहते हैं,
उनका सबसे बड़ा जवाब है —
तुम्हारा जीना, संभलना और सफल होना।
इसलिए जब भी लगे कि सब खत्म हो गया है,
थोड़ा रुक जाना,
गहरी साँस लेना,
और सोचना —
“मेरे जाने के बाद मेरे अपने क्या झेलेंगे?”
ज़िंदगी बहुत खूबसूरत है,
बस नज़रिया बदलने की ज़रूरत है।
आत्महत्या कोई समाधान नहीं,
बल्कि एक दर्दनाक भूल और मानसिक कमजोरी है।
जीना सीखो, लड़ना सीखो,
और सबसे ज़्यादा —
अपने आप से प्यार करना सीखो। ❤️
— नेहा परवीन
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ |