Sunday, 11 October 2026

हर क़रीब चेहरा अपना नहीं होता

वो लोग, जो कभी अपने थे, अब अपने से लगते नहीं, और ग़ैर तो ग़ैर थे ही, कभी अपने बनते नहीं...

अकेले रहने की ज़िद ने इतना दूर कर दिया दिखावे से, कि अब बनावटी रिश्तों के लहजे भी छुपते नहीं।

आँखें पहचान लेती हैं हर उस चेहरे की हक़ीक़त, जो सुकून का लिबास ओढ़कर दिल में उतरने आते हैं।

ये सर्दियों की ठंडक नहीं, कुछ और ही ठहराव है, ये जिस्म की सर्दी नहीं, रगों में जमा हुआ लहू है।

अब हर मुस्कुराहट के पीछे छुपी ग़रज़ महसूस होती है, हर मीठी बात में कोई न कोई कमी महसूस होती है।

शायद तन्हाई ने इतनी शिनाख़्त दे दी है मुझे, कि अब रिश्तों की गर्माहट में भी बनावट महसूस होती है।

अब न किसी के अपने होने का यक़ीन है, न किसी के ग़ैर होने का मलाल… बस दिल ने ख़ामोशी से मान लिया है— हर क़रीब चेहरा अपना नहीं होता, और हर जुदाई में सिर्फ़ फ़ासला नहीं होता।

- npidrish 

Thursday, 8 October 2026

मोहब्बत बन जाना

मेरे दर्द ने मुझे तोड़ा नहीं, तराश दिया,
मेरे अश्कों ने मुझे सींचकर एक दरख़्त बना दिया।

मोहब्बत की गर्माहट, ममता की छाँव
और किसी अपने की पनाह मुझे कभी मयस्सर न हुई…
सो मैंने अपने हिस्से की तन्हाई को भी इबादत बना लिया।

जो प्यार मेरी रूह को कभी नसीब न हुआ,
उसी की तलाश में नहीं—
उसी को बाँटने की ख़्वाहिश में जीना मुन्तख़ब किया।

शायद मेरी क़िस्मत में मोहब्बत पाना नहीं था,
मगर किसी की वीरान रूह के लिए
मोहब्बत बन जाना मैंने मुन्तख़ब किया।

Friday, 9 January 2026

एक दिन ये घर पूरा हो जाएगा।

आज फिर सपने में देखा तुम्हें, पापा…

आज फिर सपने में देखा तुम्हें, पापा,
हम थे एक दुनिया में,
जहाँ एक घर भी था।

सुंदर टाइलों वाला,
मगर थोड़ा अधूरा…

उस घर को हम तीनों भाई-बहन
और आप मिलकर बना रहे थे,
टाइल जोड़ते हुए,
हँसी जोड़ते हुए,
ज़िंदगी जोड़ते हुए।

हम अब भी छोटे थे,
वहीं बचपन ठहरा था—
कभी सीढ़ियों पर दौड़ते,
कभी कूदते-फाँदते,
और कभी आपके साथ
टाइलें जमाते।

आप कहते थे—
“एक दिन ये घर पूरा हो जाएगा।”

और मेरे दिल में बस यही उम्मीद थी,
कि जब वो दिन आए…
तो हम सब
फिर से साथ होंगे।

Saturday, 13 December 2025

तुम बेवफ़ा थे


तुम बेवफ़ा थे, इस बात का ग़म नहीं,
हमको तो हमारी वफ़ा ने ही लूटा है।


शिकायतें भी तुमसे अब क्या करें,
दिल ने हर इल्ज़ाम ख़ुद पर ही ओढ़ा है।


तुम्हारे बाद भी हमने तुम्हें चाहा,
ये जुर्म है या इबादत, किसने समझा है।


तुम्हारी बेरुख़ी का कोई मलाल नहीं,
हमें तो अपने सब्र ने ही तोड़ा है।


वो छोड़ गए, इसमें उनका क्या क़सूर,
निहा को तो उसकी वफ़ा ने ही तोड़ा है।


Tuesday, 14 October 2025

💔 जीने की हिम्मत रखो

आजकल आत्महत्या एक ट्रेंड बनती जा रही है...
मैं कहना नहीं चाहती थी, लिखना भी नहीं चाहती थी,
लेकिन आज लिखना पड़ रहा है।
जहाँ देखो, कोई न कोई सोशल मीडिया पर आकर
खुद को सही साबित करने के लिए अपनी ज़िंदगी खत्म कर रहा है।

लोग कहते हैं —
“उसने मुझे धोखा दिया...”
“उसने मुझसे झूठ बोला...”
“उसने मुझे परेशान किया...”
“उसने ऐसा किया, उसने वैसा किया...”

और फिर कहते हैं —
“वो सच्चा था इसलिए मर गया।”

लेकिन ज़रा सोचो,
जो ज़िंदा हैं, जो हर दिन दर्द और हालात से लड़ रहे हैं,
क्या वो झूठे हैं?
क्या मर जाने से सच्चे हो जाते हैं?

अगर तुम्हें लगता है कि खुद को सही साबित करने के लिए
ज़िंदगी खत्म करनी पड़ती है,
तो याद रखो —
आत्महत्या करना कोई बहादुरी नहीं,
बल्कि एक मानसिक बीमारी है।

जो व्यक्ति अपने दर्द से हार मान लेता है,
वो अपने अंदर की शक्ति को भूल जाता है।
हर दर्द, हर धोखा, हर झूठ —
एक समय के बाद सिर्फ़ सीख बन जाता है।
लेकिन ज़िंदगी खत्म कर लेना
सिर्फ़ तुम्हारी नहीं,
तुम्हारे माँ-बाप, परिवार और दोस्तों की पूरी ज़िंदगी तबाह कर देता है।

सोचो उस माँ का क्या हाल होता होगा
जिसने तुम्हें नौ महीने पेट में रखा,
रातों की नींद त्यागकर तुम्हें पाला,
और एक दिन उसे खबर मिलती है
कि उसका बच्चा अब कभी वापस नहीं आएगा।

ज़िंदगी कठिन है,
पर कठिनाइयों से लड़ने वाले ही असली विजेता होते हैं।
हर गिरने के बाद उठना सीखो,
क्योंकि हार के बाद ही नई जीत लिखी जाती है।

जो लोग तुम्हें तोड़ना चाहते हैं,
उनका सबसे बड़ा जवाब है —
तुम्हारा जीना, संभलना और सफल होना।

इसलिए जब भी लगे कि सब खत्म हो गया है,
थोड़ा रुक जाना,
गहरी साँस लेना,
और सोचना —
“मेरे जाने के बाद मेरे अपने क्या झेलेंगे?”

ज़िंदगी बहुत खूबसूरत है,
बस नज़रिया बदलने की ज़रूरत है।
आत्महत्या कोई समाधान नहीं,
बल्कि एक दर्दनाक भूल और मानसिक कमजोरी है।

जीना सीखो, लड़ना सीखो,
और सबसे ज़्यादा —
अपने आप से प्यार करना सीखो। ❤️

— नेहा परवीन
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ | 


Tuesday, 2 September 2025

3 बजे की घंटी

3 बजे की घंटी

दोस्तों, आज मैं आपको एक ऐसी सच्ची घटना सुनाने जा रही हूँ जिसने मुझे यक़ीन दिला दिया कि *अल्लाह हर जगह है... और जब चाहे, अपने होने का सबूत दे देता है।

रात के ठीक 3 बजे –
अचानक मेरे घर की घंटी इतनी ज़ोर से बजी कि मेरी नींद टूट गई। लगातार वही तेज़ आवाज़… और मेरे दोनों डॉग्स भी भौंकने लगे।
आधी नींद में, घबराई हुई मैं दरवाज़े तक पहुँची। बाहर तेज़ बारिश हो रही थी। आस-पास नज़र दौड़ाई… लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

मैं अंदर लौटी तो मेरी नज़र पड़ी अपने *बेड साइड वाले बेल बोर्ड* पर।
वह पूरी तरह लाल हो चुका था, उसमें से चिंगारियाँ निकल रही थीं। और जिस दीवार पर वह लगा था, उस पर सजाया हुआ वॉलपेपर भी आग पकड़ चुका था।

उस पल मैं सच में दहशत में आ गई।
रात का सन्नाटा, बारिश की आवाज़, और कमरे में फैलता धुआँ…
क्या करूँ? किसे बुलाऊँ? अकेली थी मैं।

काँपते हाथों से मैंने फ़ोन उठाया और पड़ोस वाली आंटी को घबराकर कहा –
आंटी, आंटी"आंटी, जल्दी आइए… बेल बोर्ड में आग लग गई है।"

इसी बीच, जलता हुआ बेल बोर्ड टूटकर नीचे गिरा। शुक्र था कि वह मेरे बेड पर नहीं गिरा। वरना मेरा पूरा सामान… सब कुछ जलकर राख हो जाता।
लेकिन अजीब बात ये थी कि वॉलपेपर की आग अचानक अपने आप बुझ गई।
बेल बोर्ड अब भी जल रहा था, धुएँ से पूरा कमरा भर चुका था… जैसे किसी की नज़र उसी रूप में जल रही हो।

तभी आंटी पहुँच गईं। उन्होंने हालात देखे और हकबका कर बोलीं –
"तू वहीं सो रही थी? अगर तू नहीं उठती तो ये जलता हुआ बोर्ड तेरे ऊपर गिरता… तेरा चेहरा जल जाता… और शायद पूरा घर भी।"

मैंने डरते-डरते कहा –
"आंटी, मैं तो घंटी की आवाज़ से उठी थी। अगर वो घंटी ना बजती तो मैं सोई रहती और सब जलकर खाक हो जाता।"


उस पल मेरी आँखों से सिर्फ़ यही निकला –
"सुक़र है या अल्लाह… तेरा सुक़र है।"

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यह घटना मेरे लिए इबादत की तरह है… एक याद दिलाने वाली कि जब कोई नहीं होता, तब भी वो होता है। 🙏

Monday, 9 June 2025

"अब मैं हूँ तुम्हारी माँ"

 "अब मैं हूँ तुम्हारी माँ"

— N.P. Idrish

हर बार तुम वही
बचपन जैसी गलती करती हो,
बिल्कुल मासूम हरकतें —
ना वक्त पर खाना,
ना दवा लेना,
ज़िद और बेपरवाह सी बातें।

और मैं?
कभी झल्ला उठती हूँ,
कभी थक जाती हूँ,
कभी तो
बस चुपचाप रो देती हूँ।

सोचती हूँ —
"कब तक संभालूँ?
कब तक हर मोड़ पर तुम्हें समझाऊँ?"

कभी गुस्से में कहती हूँ —
"अब बच्ची नहीं हो तुम!"
और फिर खुद ही रुक जाती हूँ —
क्योंकि मुझे याद आ जाता है,
अब मैं ही तो तुम्हारी माँ हूँ।

मन करता है सब छोड़ दूँ,
पर अगले ही पल
दिल से आवाज़ आती है —
"वो माँ है… और अब तू उसकी माँ बन चुकी है!"

फिर आँसू पोंछकर
तुम्हें डांटते हुए
दवाई की पर्ची खोजती हूँ,
और प्यार से कहती हूँ —
"लो माँ, टाइम हो गया है…"

क्योंकि ये रिश्ता
थोड़ा उलझा ज़रूर है,
पर बेहद गहरा है।

अब तुम गलती करती हो,
और मैं माफ़ कर देती हूँ —
जैसे कभी तुम करती थीं
मेरी नादानियों पर।

कभी-कभी
मैं तुम्हें ले जाती हूँ
मूवी दिखाने,
बाहर खाना खिलाने,
बस यूँ ही —
शायद तुम्हारे चेहरे पर
वही मासूम सी मुस्कान
लौट आए।

और कभी-कभी
जब बिना उम्मीद के
तुम मुझे गले लगा लेती हो,
तो उस पल
मुझे माँ वाली परवाह मिलती है —
वही बिना शर्त वाला प्यार।

और तब…
मैं खुद को भूलकर,
पूरी तरह
तुम्हारी माँ बन जाती हूँ।

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