Sunday, 11 October 2026

हर क़रीब चेहरा अपना नहीं होता

वो लोग, जो कभी अपने थे, अब अपने से लगते नहीं, और ग़ैर तो ग़ैर थे ही, कभी अपने बनते नहीं...

अकेले रहने की ज़िद ने इतना दूर कर दिया दिखावे से, कि अब बनावटी रिश्तों के लहजे भी छुपते नहीं।

आँखें पहचान लेती हैं हर उस चेहरे की हक़ीक़त, जो सुकून का लिबास ओढ़कर दिल में उतरने आते हैं।

ये सर्दियों की ठंडक नहीं, कुछ और ही ठहराव है, ये जिस्म की सर्दी नहीं, रगों में जमा हुआ लहू है।

अब हर मुस्कुराहट के पीछे छुपी ग़रज़ महसूस होती है, हर मीठी बात में कोई न कोई कमी महसूस होती है।

शायद तन्हाई ने इतनी शिनाख़्त दे दी है मुझे, कि अब रिश्तों की गर्माहट में भी बनावट महसूस होती है।

अब न किसी के अपने होने का यक़ीन है, न किसी के ग़ैर होने का मलाल… बस दिल ने ख़ामोशी से मान लिया है— हर क़रीब चेहरा अपना नहीं होता, और हर जुदाई में सिर्फ़ फ़ासला नहीं होता।

- npidrish 

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